पश्चिमी घाट में बाघों और अन्य बड़े मांसाहारी जीवों के लिए कनेक्टिविटी में सुधार

उत्तरी पश्चिमी घाट के ‘सह्याद्रि टाइगर लैंडस्केप’ में डब्लू.सी.टी. के दीर्घकालिक अध्ययन ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि इस क्षेत्र में चार बड़े मांसाहारी जीव — बाघ, ढोल (जंगली कुत्ता), तेंदुआ और स्लॉथ भालू — किस स्थिति में हैं । यह अध्ययन हमें निम्नलिखित पहलुओं को समझने में मदद करता है: ये जानवर इस लैंडस्केप के संरक्षित क्षेत्रों के भीतर और बाहर किस प्रकार जीवित रह रहे हैं? क्या कॉरिडोर (गलियारे) इन मांसाहारी जीवों की आबादी के लिए आवश्यक आवास और कनेक्टिविटी प्रदान करते हैं? इन कॉरिडोर का विखंडन प्रजातियों द्वारा लैंडस्केप के उपयोग को किस प्रकार प्रभावित करता है? साल 2020 और 2021 में, महाराष्ट्र सरकार द्वारा सह्याद्रि टाइगर लैंडस्केप में पांच नए संरक्षण रिजर्व अधिसूचित किए गए थे । इसके परिणामस्वरूप, सामूहिक रूप से 500 वर्ग किलोमीटर से अधिक वन क्षेत्र को कानूनी सुरक्षा के दायरे में लाया गया है ।

Western Ghats: Improving Large Carnivore Connectivity
साभार: अक्षय जकारिया/डब्लू.सी.टी.

अध्ययन ने इस लैंडस्केप के मौजूदा और नए घोषित संरक्षित क्षेत्रों में बड़े मांसाहारी जीवों के लिए सुरक्षा स्तरों में सुधार की आवश्यकता की ओर भी संकेत किया है। डब्लू.सी.टी. उत्तरी पश्चिमी घाट कॉरिडोर के लिए प्रबंधन योजना का मसौदा तैयार करने हेतु महाराष्ट्र वन विभाग के साथ मिलकर काम कर रहा है, जिसमें नए घोषित संरक्षण रिजर्व भी शामिल हैं। इसके अलावा, क्षेत्र के फ्रंटलाइन वन कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाने के लिए, डब्लू.सी.टी. ‘वन्यजीव अपराध स्थल जांच’, फॉरेंसिक और वन्यजीव कानून प्रवर्तन पर प्रशिक्षण सत्र आयोजित कर रहा है, और फ्रंटलाइन कर्मचारियों को आवश्यक फील्ड गियर (मैदानी उपकरणों) से लैस कर रहा है।

WCT’s Conservation Biologist trains the frontline forest staff of the newly formed Chandgad and Tillari Conservation Reserves in camera trapping.
फोटो कैप्शन: डब्लू.सी.टी. के संरक्षण जीवविज्ञानी, नवगठित चंदगढ़ और तिलारी संरक्षण रिजर्व के फ्रंटलाइन वन कर्मचारियों को कैमरा ट्रैपिंग का प्रशिक्षण देते हुए। फोटो साभार: रिज़वान मिथावाला/डब्लू.सी.टी.

“विस्तृत लैंडस्केप स्तर पर संरक्षण हस्तक्षेपों का खाका तैयार करना, दूर-दूर तक विचरण करने वाले स्तनधारी वन्यजीवों के लिए अत्यंत आवश्यक है। उत्तरी पश्चिमी घाट में हमारा कार्य एक व्यापक स्तर का परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है, जो इस क्षेत्र में बाघ और तीन अन्य बड़े मांसाहारी जीवों की संख्या बढ़ाने के उद्देश्य से किए जाने वाले संरक्षण कार्यों का मार्गदर्शन कर सकता है। इससे संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को भी लाभ पहुँचेगा, जिसके प्राथमिक लाभार्थी मनुष्य ही हैं।” — गिरीश पंजाबी, संरक्षण जीवविज्ञानी, डब्लू.सी.टी.



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