
संघर्ष और सह-अस्तित्व
भारत के बाघ अभयारण्यों में वाहनों से संचालित (जीप) सफारी को लेकर होने वाली बहस अक्सर तथ्यात्मक समझ से अधिक विवाद को जन्म देती है। आलोचक प्रायः वाहन आधारित सफारी पर्यटन को एक ऐसे पारिस्थितिक व्यवधान के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो मानव–बाघ संघर्ष को बढ़ाता है। हालांकि, विभिन्न बाघ अभयारण्यों में तीन दशकों से नियंत्रित और विनियमित सफारी संचालन के अनुभवों में ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण सामने नहीं आया है कि सुव्यवस्थित और उचित प्रबंधन के अंतर्गत संचालित वाहन पर्यटन मानव–बाघ संघर्ष को बढ़ाता है। इसके विपरीत, शोध और जमीनी अनुभव लगातार यह संकेत देते हैं कि आवास का क्षरण, शिकार प्रजातियों की कमी, आवासों का विखंडन और वन्यजीव गलियारों का बाधित होना मानव–बाघ संघर्ष के प्रमुख कारण हैं। इसके विपरीत, निर्धारित मार्गों तक सीमित और उचित रूप से प्रबंधित पर्यटन वाहन इस संघर्ष के प्रमुख कारणों में शामिल नहीं हैं।
धारणा से परे संरक्षण
भारत में जीप सफारी स्पष्ट रूप से निर्धारित पर्यटन क्षेत्रों के भीतर संचालित होती हैं। वन विभाग वाहनों की संख्या को नियंत्रित करता है, निर्धारित मार्ग तय करता है और प्रवेश तथा निकास के लिए सख्त समय-सीमा लागू करता है। ये बाघों के मुख्य आवासों में होने वाले अनियंत्रित हस्तक्षेप नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) द्वारा निर्धारित स्थानिक क्षेत्र-विभाजन और प्रबंधन व्यवस्था के अंतर्गत संचालित सुव्यवस्थित गतिविधियाँ हैं। दशकों से किए गए पारिस्थितिक अनुसंधानों से यह स्पष्ट हुआ है कि बाघों के परिदृश्य में मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए निम्नलिखित संरक्षण प्रयास कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं—
- क्षतिग्रस्त आवासों का पुनर्स्थापन
- बाघ अभयारण्यों के ऐसे मुख्य क्षेत्रों को सुरक्षित रखना जहाँ मानवीय हस्तक्षेप न हो
- वन्यजीव गलियारों की निरंतरता और प्रभावी कार्यक्षमता बनाए रखना
- जंगली शिकार प्रजातियों की आबादी को मजबूत करना
- बाघ अभयारण्यों के बफर क्षेत्रों और निर्धारित वन्यजीव गलियारों में रहने वाले समुदायों की आजीविका और कल्याण को सहयोग प्रदान करना
जब इन प्राथमिकताओं पर प्रभावी ढंग से काम किया जाता है, तो पर्यटन और संरक्षण के उद्देश्यों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है। केवल जीप सफारी को मानव–वन्यजीव संघर्ष से जोड़कर देखना एक जटिल पारिस्थितिक वास्तविकता को अत्यधिक सरल रूप में प्रस्तुत करना है।
वन्यजीव और जल सुरक्षा
बाघ और हाथी केवल आकर्षक विशाल वन्यजीव नहीं हैं—वे संपूर्ण वन पारिस्थितिक तंत्रों की सेहत और जीवंतता के प्रतीक हैं। वहीं वन केवल वन्यजीवों के आवास भर नहीं हैं; वे जीवंत जलागार के रूप में भी कार्य करते हैं। यदि हम इन सभी कड़ियों को एक साथ देखें—बाघ और हाथी से वन तक, वन से जल और मिट्टी तक, और जल एवं मिट्टी से उन अत्यंत गरीब समुदायों तक, जो इन परिदृश्यों में और इनके आसपास रहते हैं—तो वास्तविकता स्पष्ट हो जाती है: बाघ और हाथी जैसे वन्यजीवों के संरक्षण के प्रतीक प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण, मानव जीवन की सुरक्षा से अलग नहीं किया जा सकता। जिसे पहली नजर में केवल वन्यजीव संरक्षण दिखाई देता है, वह वास्तव में पूरे भू-दृश्य के स्तर पर जीवन को सहारा देने वाली एक व्यापक प्राकृतिक व्यवस्था है।
मध्य प्रदेश की दूरदर्शी पहल
वन्यजीव पर्यटन केवल मनोरंजन या अवकाश से जुड़ा उद्योग नहीं है। अनेक वन क्षेत्रों वाले जिलों में यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार बन चुका है। सफारी से जुड़ी अर्थव्यवस्था स्थानीय गाइडों, वाहन चालकों, वाहन मालिकों और छोटे आतिथ्य व्यवसायों की आजीविका को सहारा देती है। इसके साथ ही होम-स्टे संचालकों, होटल कर्मचारियों, सब्जी विक्रेताओं, स्थानीय कारीगरों और परिवहन सेवाओं से जुड़े लोगों तक इसका व्यापक आर्थिक प्रभाव पहुँचता है।
मध्य प्रदेश इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह राज्य भारत में जंगली बाघों की सबसे बड़ी आबादी का घर है। वर्ष 2024–25 में इसके पाँच प्रमुख बाघ अभयारण्यों—कान्हा, बाँधवगढ़, पेंच, सतपुड़ा और पन्ना—ने केवल वाहन आधारित सफारी से प्रवेश शुल्क के रूप में लगभग 59 करोड़ रुपये अर्जित किए। सफारी शुल्क के वितरण को शामिल करने पर लगभग 80 करोड़ रुपये अतिरिक्त रूप से वाहन मालिकों, चालकों और गाइडों तक पहुँचे, जिनमें से अधिकांश बाघों के परिदृश्य में रहने वाले स्थानीय ग्रामीण समुदायों से आते हैं।
इसका व्यापक आर्थिक प्रभाव और भी उल्लेखनीय है। आवास, भोजन सेवाओं, परिवहन तथा अन्य संबंधित खर्चों को शामिल करने पर इन पाँच बाघ अभयारण्यों से जुड़ी वार्षिक आर्थिक गतिविधियों का अनुमान लगभग 770 करोड़ रुपये लगाया गया है। यह आँकड़ा वास्तविक आर्थिक प्रभाव से कम भी हो सकता है, क्योंकि इन क्षेत्रों के कई उच्चस्तरीय रिसॉर्ट अपेक्षाकृत अधिक शुल्क लेते हैं। इसलिए वन्यजीव पर्यटन को केवल एक सीमित गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने वाले एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देखा जा सकता है।
एक जीवित बाघ को ‘नवीकरणीय प्राकृतिक संपदा’के रूप में देखा जा सकता है। अपने पूरे जीवनकाल में एक बाघ निरंतर पर्यटन आय का सृजन कर सकता है, जो अवैध शिकार या प्रतिशोध में बाघ की हत्या से मिलने वाले अल्पकालिक आर्थिक लाभ से कहीं अधिक लंबे समय तक बनी रह सकती है।
ताडोबा से मिलने वाली सीख
महाराष्ट्र का ताडोबा–अंधारी बाघ अभयारण्य इस संबंध में एक और महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। यहाँ पर्यटन के लिए कुल 25 प्रवेश द्वार हैं—छह मुख्य क्षेत्र में, 16 बफर क्षेत्र में और तीन क्षेत्रीय वन क्षेत्रों में। इन प्रवेश द्वारों के माध्यम से स्थानीय समुदायों के लिए निरंतर रोजगार और आजीविका के अवसर उपलब्ध होते हैं। विशेष रूप से, बफर और क्षेत्रीय वन क्षेत्रों में स्थित 19 प्रवेश द्वार पूरे वर्ष पर्यटकों के लिए खुले रहते हैं।
वार्षिक अनुमानों के अनुसार:
- वन विभाग को पार्क प्रवेश शुल्क के रूप में लगभग 40 करोड़ रुपये प्राप्त होते हैं।
- वाहन आधारित सफारी से जुड़े वाहन मालिकों, चालकों और गाइडों को लगभग 60 करोड़ रुपये की आय होती है।
- व्यापक पर्यटन अर्थव्यवस्था के माध्यम से लगभग 400 करोड़ रुपये का आर्थिक प्रवाह होता है।
ये आँकड़े केवल सरकारी राजस्व तक सीमित आर्थिक गतिविधि को नहीं दर्शाते, बल्कि एक ऐसी सुव्यवस्थित मूल्य-श्रृंखला को सामने रखते हैं, जिसका प्रभाव स्थानीय स्तर पर रोजगार और आजीविका के व्यापक अवसरों के सृजन तक पहुँचता है।
संरक्षण और निजी हितों के बीच संतुलन
कर्नाटक को कुछ ऐसे सीमित और प्रभावशाली लोगों की सामाजिक–राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से सावधान रहना होगा, जिनके कार्य लंबे समय से देश की संरक्षण भावना को कमजोर करने का जोखिम पैदा कर सकते हैं। राज्य के लिए मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से सीख लेना उपयोगी होगा और पर्यटन संचालन पर सरकारी तंत्र के एकाधिकार को कम करने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। ऐसे सुधारों से पर्यटन से होने वाली आय का एक बड़ा हिस्सा केवल सीमित संख्या में स्थायी सरकारी कर्मचारियों तक केंद्रित रहने के बजाय उन स्थानीय समुदायों तक पहुँचाया जा सकेगा, जो बाघों और हाथियों के साथ अपने आसपास के क्षेत्रों में रहते हैं और मानव–वन्यजीव सह-अस्तित्व की वास्तविक लागत नियमित रूप से वहन करते हैं। पारिस्थितिक तंत्रों के क्षरण का सबसे पहला और गंभीर प्रभाव सबसे गरीब समुदायों पर पड़ता है। वहीं, जब इन पारिस्थितिक तंत्रों का पुनर्स्थापन होता है, तो उसका लाभ भी सबसे पहले इन्हीं समुदायों तक पहुँच सकता है। प्रकृति-संवेदनशील पर्यटन के माध्यम से नीतियों को स्थानीय समुदायों की आवश्यकताओं और आजीविका से जोड़कर हम स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत कर सकते हैं और साथ ही इन विशाल स्तनधारियों तथा उन वनों के भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं, जिन पर हमारा जीवन भी निर्भर है।
लाभों का साझा वितरण
इस पूरी व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण, लेकिन अक्सर अनदेखा किया जाने वाला पहलू है—पर्यटन से होने वाली आय का पुनर्वितरण। वन विभागों द्वारा एकत्र किए जाने वाले सफारी प्रवेश शुल्क का लगभग आधा हिस्सा बाघ अभयारण्यों के बफर क्षेत्रों में स्थित गाँवों तक ग्राम-स्तरीय इको-डेवलपमेंट समितियों के माध्यम से पहुँचाया जाता है। इन निधियों का उपयोग गाँव के स्तर पर तय की गई बुनियादी ढाँचे की परियोजनाओं, आजीविका में विविधता लाने और सामुदायिक कल्याण से जुड़ी पहलों के लिए किया जाता है।
उन किसानों के लिए, जिनकी फसलों को जंगली शाकाहारी वन्यजीवों के कारण नुकसान पहुँचता है, पर्यटन से होने वाली आय एक महत्वपूर्ण आर्थिक सहारा प्रदान कर सकती है। जहाँ वन्यजीव स्थानीय समुदायों के लिए प्रत्यक्ष और ठोस आर्थिक लाभ का माध्यम बनते हैं, वहाँ उनके प्रति सहनशीलता भी बढ़ने की संभावना रहती है। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में इसका एक स्पष्ट उदाहरण देखने को मिलता है। ये दोनों राज्य मिलकर भारत की जंगली बाघ आबादी के लगभग एक-तिहाई हिस्से को आश्रय देते हैं। इन राज्यों में बड़े मांसाहारी वन्यजीवों के साथ समुदायों का सह-अस्तित्व महज संयोग नहीं है; इसमें स्थानीय लोगों की आर्थिक भागीदारी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
संरक्षण-अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से देखा जाए तो जीवित बाघ एक नवीकरणीय प्राकृतिक संपदा है। अपने जीवनकाल में वह लगातार पर्यटन आय उत्पन्न कर सकता है, जो अवैध शिकार या प्रतिशोध में उसकी हत्या से मिलने वाले अल्पकालिक आर्थिक लाभ से कहीं अधिक हो सकती है। जब स्थानीय समुदाय वन्यजीवों को बिना किसी प्रतिपूर्ति वाले जोखिम के बजाय स्थिर आय के स्रोत के रूप में देखने लगते हैं, तो उनके साथ सह-अस्तित्व आर्थिक रूप से भी तर्कसंगत बन जाता है।
वन्यजीवों के प्रति भारत की दीर्घकालिक सांस्कृतिक श्रद्धा इस मॉडल के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करती है। इस श्रद्धा को पारदर्शी और न्यायसंगत आय-साझाकरण व्यवस्थाओं से जोड़कर संरक्षण और सामाजिक स्थिरता—दोनों को मजबूत किया जा सकता है।
साधन, खतरा नहीं
नियंत्रित जीप सफारी मानव–बाघ संघर्ष का प्रमुख कारण नहीं हैं। उचित और प्रभावी प्रबंधन के अंतर्गत संचालित होने पर वे संरक्षण के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचे के विकास में आर्थिक सहयोग देती हैं, ग्रामीण आजीविकाओं को सहारा प्रदान करती हैं और मानव–वन्यजीव सह-अस्तित्व को प्रोत्साहित करती हैं। वास्तविक संरक्षण चुनौती वन आवासों की अखंडता बनाए रखने, वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और स्थानीय समुदायों के साथ दीर्घकालिक सहभागिता कायम रखने में है। यदि भारत के बाघ परिदृश्यों को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रखना है, तो संरक्षण की प्रक्रिया में उन लोगों के हितों और आजीविकाओं को केंद्र में रखना होगा, जो वन्यजीवों के साथ रहकर उनकी उपस्थिति का प्रत्यक्ष प्रभाव झेलते हैं। जब पारिस्थितिक सुरक्षा और आर्थिक अवसर एक-दूसरे के साथ आगे बढ़ते हैं, तो बाघों और स्थानीय समुदायों—दोनों के लिए लंबे समय तक सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की संभावनाएँ मजबूत होती हैं।
यह लेख मूल रूप से जून 2026 में प्रकाशित सैंक्चुअरी एशिया के अंक में प्रकाशित हुआ था।
लेखक के बारे में
डॉ. अनिश अंधेरिया वाइल्डलाइफ़ कंज़र्वेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। इस संस्था की स्थापना श्री हेमेन्द्र कोठारी ने की थी। डॉ. अंधेरिया, एक फील्ड बायोलॉजिस्ट हैं और नीति-निर्माताओं के साथ मिलकर वन्यजीव संरक्षण के लिए स्थानीय समुदायों का समर्थन जुटाने की दिशा में कार्य करते हैं।
अस्वीकारण: लेखक, वाइल्डलाइफ कंज़र्वेशन ट्रस्ट से जुड़े हुये हैं। इस लेख में प्रस्तुत किए गए मत और विचार उनके अपने हैं, और ऐसा अनिवार्य नहीं कि उनके मत और विचार, वाइल्डलाइफ कंज़र्वेशन ट्रस्ट के मत और विचारों को दर्शाते हों।
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